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शुक्रवार, 20 जनवरी 2017

बाकी तो सब कुछ चंगा जी -ओंम प्रकाश नौटियाल

बाकी तो सब कुछ चंगा जी -ओंम प्रकाश नौटियाल
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कट रहे वृक्ष औ’ शाखाएं
अद्‍भुत विकास की गाथायें
हरियाली हरते हठधर्मी
ना लाज हया बस बेशर्मी
धरा को किया अधनंगा जी
बाकी तो सब कुछ चंगा जी !

गाँवों में मिलते गाँव नहीं
तरु की रही कहीं छाँव नहीं
तडाग तल्लैया सूख गये
पक्षी रह प्यासे रूठ गये
हर गाँव हुआ बेढंगा जी
बाकी तो सब कुछ चंगा जी !

नवजात बिलखते घूरे में
वृद्धों की श्वास अधूरे में
गुमराह भटकता युवा वर्ग
अनमोल समय हो रहा व्यर्थ
सपना देखें सतरंगा जी
बाकी तो सबकुछ चंगा जी !

हो गए शहर  इतने शहरी
जनता तो बस गूंगी बहरी
सब अपने अपने में खोये
औरों के दुख में क्यों रोयें ?
हर एक शख्स  बेरंगा जी
बाकी तो सबकुछ चंगा जी !

निकलें घर से जब महिलायें
घुमडे मन में बस शंकायें
राह में कैसे करें  बचाव
जाएं निर्भय अपने  पडाव
हो राह न कहीं लफ़ंगा जी
बाकी तो सब कुछ चंगा जी !

तब हमें भी कुछ सद्‍बुद्धि थी
तरंगिणियाँ करती  शुद्धि थी
नदियाँ थी तब जीवन हाला
जो आज बनी गन्दा नाला
बरसों से मैली गंगा जी
बाकी तो सब कुछ चंगा जी !

सत्ता सुख में नेता पागल
जनतंत्र हुआ चोटिल घायल
सेवा करना बदकाम हुआ
जनता का स्वप्न तमाम हुआ
दुश्कर है इनसे पंगा जी
बाकी तो सब कुछ चंगा जी !

कुटुम्ब की भूख मिटाने को
एक रसद पत्र बनाने को
काम बहुत सरल समझना मत
देनी पड  जायेगी रिश्वत
वरना अडेगा अडंगा जी
बाकी तो सब कुछ चंगा जी !

जनतंत्र भटकता गली गली
फिर से चुनाव की हवा चली ,
कुर्सी को पाने की खातिर
बस जहर घोलते हैं शातिर ,
करते  शहरों में दंगा जी
बाकी तो सब कुछ चंगा जी !

आतंकी हैं, कहीं नक्सली
अलगाववाद की हवा चली
क्षेत्रियता भारत पर भारी
नेता कुर्सी पर बलिहारी
सहमा सा उडे तिरंगा जी
बाकी तो सब कुछ चंगा जी !

मैं तो हूं भाई दीन हीन
टप्पर विहीन छप्पर विहीन
बस भूख प्यास मेरे संगी
हैं मित्र अभाव और तंगी
जल रहा हूं ज्यों पतंगा जी
बाकी तो सबकुछ चंगा जी !
-ओंम प्रकाश नौटियाल
बड़ौदा,9427345810
पुस्तक "पावन धार गंगा है "से (सर्वाधिकार सुरक्षित)

गढ़ी जा रही ‘वास्तविकताओं’ की जादुई तस्वीर: नाकोहस- संजय जोठे


गढ़ी जा रही वास्तविकताओंकी जादुई तस्वीर: नाकोहस

नाकोहस एक सामान्य उपन्यास नहीं है. अपनी बुनावट में ये जिन मुद्दों और सरोकारों को शामिल करता है वे समाज, शिक्षा, राजनीति, संस्कृति, प्रगतिशीलता और सामान्य बोध से गहराई से जुड़े हैं. बीते कुछ दशकों में खासकर वैश्वीकरण और उत्तर आधुनिकता की छांव में आधुनिकता को नकारते हुए अस्मिता की लड़ाइयों या राजनीतियों ने बहुत सारे रूप धरे हैं.

विश्वस्तर पर अस्मिता की खोज और अस्मिताओं को उभारने - नकारने के जो आन्दोलन या प्रवृत्तियाँ जन्मी हैं, उनके घमासान में भावनाओं, आस्थाओं और निष्ठाओं का प्रश्न अब बहुत महत्वपूर्ण बनता जा रहा है, और बनाया भी जा रहा है. इसके जो नकारात्मक पक्ष हैं वे किन्हीं खेमों की षड्यंत्रकारी राजनीति के हाथ में पड़कर भयानक हथियारों में बदलते जा रहे हैं. आहत भावनाऐसा ही एक भयानक हथियार है जो बहुत बारीकी से हर राष्ट्रभक्त” “धर्मप्राणसंस्कृति गर्वी” “भारतीयया देशप्रेमीके मन में आसानी से निर्मित किया जा सकता है.

इस हथियार की स्वीकृति, मारक क्षमता और पहुँच अद्भुत है, ये गजब का आविष्कार है जो मरणासन्न समाज खुद अपने ही खिलाफ इस्तेमाल करता है और उस समाज को आत्मघात हेतु उकसाने वाले धर्म, संस्कृति और समाज के ठेकेदार आदरणीय भी बने रहते हैं.

आहत भावनाओं और इन पर सवार एक नये किस्म के फासीवाद के इस पूरे मनोविज्ञान को उजागर करती यह रचना असल में बीत गये से ज्यादा चल रहे की बात करती है और शायद उससे भी ज्यादा उसकी बात करती है जो आने वाला है. आधुनिकता का नकार जिस तरह से दक्षिणपंथ और कारपोरेट के गठजोड़ को ताकत दे रहा है उसकी प्रष्ठभूमि में भारत में धर्म, संस्कृति, वर्ण, परम्परा और सर्वाधिक महत्वपूर्ण - जाति और जेंडर के उभरते विमर्शों को अनेकों रंगों में रंगने का प्रयास हो रहा है.

इतिहास, संस्कृति, भाषा, दर्शन, लोक-साहित्य, परंपरा, पुरातत्व और मानवशास्त्र की खोज एसा बहुत कुछ नया ला रही है जिससे भारत में ज्ञात और प्रयासपूर्वक निर्मित मेटा नेरेटिवको बहुत दिशाओं से चोट पहुँचने वाली है. ऐसे में स्वदेशी इंडोलोजी या पौराणिक मिथकों में आधुनिकता के सूत्र प्रक्षिप्त करके स्वयं आधुनिकता को ही नकारकर प्राचीन सतयुग में खींच ले जाने वाले प्रयास भी अब बढ़ते जाने वाले हैं. इस प्राचीन नेरेटिव में बहुत सारे निहित स्वार्थों की प्रेरणाएं हैं जो अतीत और भविष्य को अपने-अपने ढंग से रंगना चाहती हैं. ऐसे में वह खेमा जो पश्चिम से ही नहीं बल्कि भारत की देशज प्रगतिशीलता के आवश्यक तत्वों को भी भविष्य निर्माण के लिए सावधानी से चुन लेना चाहता है, उसकी लड़ाई उस विपक्षी खेमे से होनी तय है जो कि पूर्वाग्रहों और निहित स्वार्थों से प्रेरित उस प्राचीन मेटा नेरेटिव के स्वघोषित रक्षक बने हुए हैं, या रक्षक नजर आते हुए कुछ अन्य ही राजनीती खेलते आये हैं.

ये मेटा नेरेटिव भारत के इतिहास को एक विश्वगुरु और धर्मप्राण भारतवर्ष की तरह देखना चाहता है जिसमे आई खराबियां और गुलामियाँ सब दूसरों की दी हुई हैं और जिसमे उभरी श्रेष्ठताएँ इतनी दिव्य हैं कि उनको समझना स्वयं भारतीयों के लिए कठिन है, ऐसे में स्वाभाविक रूप से प्रश्न उठता है कि ये श्रेष्ठताएँ भारतीय समाज को सभ्य, लोकतान्त्रिक, वैज्ञानिक और प्रगतिशील क्यों नहीं बना सकीं? अब ऐसे प्रश्न उठते ही बहुतों की भावनाएं आहतहो जाती हैं. फिर शुरू होता है आहत भावनाओं का तांडव और इसके समानांतर रचे गये षड्यंत्र जो अब हर खेमे की राजनीति का मुख्य स्वर बनते जा रहे हैं. ये आहत भावनाएं और इनके रक्षण के आग्रहों का दबाव और खेल ही इस नेशनल कमीशन फॉर हर्ट सेंटिमेंट नाकोहसकी प्रेरणा है.

यह उपन्यास जिस खतरे को उजागर करता है उसे एक अन्य दिशा में भी पलता हुआ देखा जाना चाहिए. हालाँकि उस दिशा में इशारा करना खतरनाक है लेकिन ये खतरा मोल लेना ही होगा. भारत में न सिर्फ सनातन संस्कृति के रक्षकों की भावनाओं से ही खिलवाड़ नहीं हो रहा है. इस उपन्यास में गिनाये गये बौनेसर (बौद्धिक नैतिक संस्कृति रक्षक), या चौड़ासिंग और सपाटचन्द सभी खेमों और अस्मिताओं की राजनीतियों में फ़ैल गये हैं.

मुस्लिमों की अपनी आहत भावनाएं हैं, दलितों आदिवासियों के शोषकों ने अपनी तरफ से दलितों की आहत भावनाओं की इबारत बनाकर पेश करना शुरू कर दिया है अब दलित आन्दोलन या जेंडर विमर्श को भी आहत भावनाओं के खेल की मदद से बौद्धिक यात्रा से भटकाने का प्रयास चलने लगा है. मुस्लिम आहत भावनाओं को षड्यंत्रपूर्वक इस्तेमाल करते हुए बीते साठ सत्तर सालों में उन्हें मदरसों, बुर्कों और तीन तलाकों में कैद करके रखा गया है. इसी तरह दलितों, आदिवासियों, स्त्रीयों के खेमों से आने वाली आहत भावनाओंकी जोर शोर से खोज हो रही है और अब वे अधिकाधिक महत्वपूर्ण होती जायेंगी और इन भावनाओं के आहत होने की घोषणा करने वाले आश्चर्यजनक रूप से वे लोग हैं जिन्हें इन भावनाओं को षड्यंत्र की तरह इस्तेमाल करके दलितों, मुसलमानों और आदिवासियों का शोषण करना है. ऐसे में इन खेमों में एक इमानदार विमर्श की या बौद्धिक नवाचारों की संभावनाओं को आहत भावनाओं के हथियार से कुचला जायेगा.

अंबेडकर के ब्राह्मणीकरण के प्रयास के समानांतर उन्हें एक हिन्दू समाज सुधारक बनाने का या एक देवता बनाने का जो प्रयास है उसमे इस खतरे को सूंघा जा सकता है. दलितों, पिछड़ों, मुसलमानों और स्त्रीयों को उनकी आहत भावनाओंके प्रति सेलेक्टिव ढंग से कंडीशन किया जा सकता है और उनके आहत होने या न होने का निर्णय भी कहीं दूर बैठकर लिया जाएगा.

इस तरह न केवल हिन्दू समाज के संस्कृति रक्षकों और धर्म भीरुओं की भावनाओं का शोषण बढ़ता जायेगा बल्कि इससे कहीं भयानक खेल जो अब शुरू हो रहा है वह है पिछड़ों, बहुजनों की आहत भावनाओं से खिलवाड़ - जो खुद उन्ही के खिलाफ उन्ही से खिलवाया जाएगा. मेरे लिए इस उपन्यास से मिलने वाला सबसे बड़ा सन्देश यही है. इस खतरे के संकेत साफ़ देखे जा सकते हैं. बहुजनों, पिछड़ों दलितों के नायकों की प्रचलित छवियों में देवत्व आरोपित करके उस देवत्व की महिमा या अपमान की परिभाषा को नियंत्रित करके इन समुदायों को बौद्धिक रूप से सक्षम होने से रोका जाएगा रोका जाने लगा है. इस खेल में ये समुदाय स्वयं भी कब शामिल हो जायेंगे यह भी कहना कठिन है.

इस उपन्यास के तीन मुख्य किरदार जिस प्रष्ठभूमि में इन प्रश्नों से जूझ रहे हैं वह प्रष्ठभूमि कोमरेड चंद्रशेखर, रोहित वेमुला, कन्हैया या नजीब अहमद के बाद के उभरते प्रश्नों से निर्मित होती है. विश्वविद्यालय न सिर्फ भविष्य का बल्कि अतीत का भी आइना होता है जहां जीवित वर्तमान इन दोनों को तौलते हुए अपने लिए करणीय की तलाश करता है. इसी तलाश में इस उपन्यास के तीन मुख्य किरदार अपनी आधी उम्र इन प्रश्नों से जूझते हुए गुजार चुके हैं.

ये तीनों किरदार जो तीन भिन्न धर्मों से आते हुए भी धर्म मात्र की राजनीति को नकारते आये हैं उनकी व्यथा कथा हमारे पूरे समाज की पोस्टमार्टम रिपोर्ट नजर आती है. उपन्यास की शुरुआत पौराणिक आख्यान गजेन्द्र मोक्षके रूपक से होती है और बुद्धि, बल के प्रतीक हाथी को शैतानी और धूर्त मगरमच्छों के जबड़े में फंसता हुआ दिखाया जाता है जो उपन्यास के अंत तक जारी रहता है. निश्चित ही रेंगने वाला मगरमच्छ हाथी के पाँव दबोचकर उस कीचड में ले जाना चाहता है जहां निशाचरों और मगरमच्छों का साम्राज्य है, वहीं इस बुद्धि और बल की ह्त्या की जा सकती है.

ये बल या बुद्धि आधुनिकता और सूचना क्रांति से हासिल हुई है जिससे सजे गजेन्द्र को दिन दहाड़े उस कीचड में खींचा जा रहा है जहां से कमल पैदा होते हैं. इस ह्त्या के षड्यंत्र को देखते हुए भी नारायण या विष्णु का कहीं कोई अता-पता नहीं है. यह रूपक आज की पीढ़ी की समझ और रुझान के बाहर होते हुए भी महत्वपूर्ण है. दो बौनेसरमगरमच्छ चौड़ा सिंह और सपाट चन्द जो राजनीति और कारपोरेट के प्रतिनिधि हैं वे उस हाथी को डुबाये जा रहे हैं जो काल के तीनों खण्डों की श्रेष्ठताओं के सत्व को समेटकर जीनेवाले उन तीन भिन्न धर्मों से आने वाले मित्रों का सम्मिलित प्रतीक है.

ये बौनेसर मगरमच्छ क्या कर रहे हैं? कमल के फूलों से पटे पड़े दलदल में बैठकर ये देशप्रेम, देशद्रोह, प्रगतिशीलता और संस्कार की परिभाषाएं तय कर रहे हैं और भावनाओं के आहत होने का फतवा जारी कर रहे हैं. भगत सिंह जैसे नास्तिक को पगड़ी पहनाकर एक धर्म विशेष से जोड़ना हो या गीता जयंती पर पोस्टरों में अंबेडकर की तस्वीर इस्तेमाल करना हो. या फिर मकबूल फ़िदा हुसैन की पेंटिंग्स में नग्नता खोजनी हो या अनंतमूर्ति के लेखन में ईशनिंदा या संस्कृति निंदा खोजनी हो सबमे एक ही खेल चल रहा है. अनंतमूर्ति और हुसैन के साथ रचे खेल को तो हमने देखा लेकिन भगतसिंह और अंबेडकर का हिन्दुकरण या ब्राह्मणीकरण इससे भी आगे का खेल है और निस्संदेह वह भी इसी आहत भावना के रथ पर बैठे महारथी ही खेलेंगे.

उपन्यास के एक नायक सुकेत की प्रष्ठभूमि, उसका जीवन उसके रुझान और उसकी सीमाएं बहुत कुछ व्यक्त करती हैं. उसके साथ एक मध्यकालीन बर्बरता जिस तरह का व्यवहार करती है उसके समानांतर भी एक अन्य कथा चल रही है.

विश्वविद्यालयों में प्रेम की उष्मा की चाह और देह की मांग के दबाव के साथ जीने का प्रयास करने वाली युवा बौद्धिकता कदम-कदम पर खुद अपनी ही प्रगतिशीलता की इबारतों में संशोधन करना चाहती है. नारीवाद, सेक्युलरिज्म, प्रगतिवाद, रिश्तों की पारदर्शिता और प्रेम की राजनीति में भी आहत भावनाएं समानांतर बह रही हैं. इस तरह यह उपन्यास समाज की राजनीति के साथ व्यक्तिगत रिश्तों की राजनीति की तरफ भी गहराई से संकेत करता चलता है और बहुत खूबसूरती से इन दो समानांतर धाराओं में एक दिशासाम्य खोजकर सिद्ध कर देता है यह आवश्यक भी है क्योंकि जो समाज अपने सार्वजनिक जीवन में षड्यंत्र का शिकार है उसके एकांत जीवन में और बेडरूम तक में भी षड्यंत्र फ़ैल ही जाने वाला है.

ये एक अन्य समानांतर सन्देश है जो बहुत मुखर होकर इस उपन्यास में मौजूद है और जिसे युवा पीढ़ी नजरअंदाज नहीं कर सकती. उपन्यास के तीन अधेड़ नायकों का नाकोहस के बौनेसरप्रतिनिधियों द्वारा उत्पीडन और उन्हें समझाने का जो उपक्रम है वह भी बहुत सूचक है. ये बौनेसर अन्तर्यामी प्रतीत होते हैं सुकेत की चिंताओं और इतिहास को पढ़ लेते हैं. यह बहुत गहरा संकेत है. सुकेत, रघु या शम्स जैसे प्रगतिशील भी जिस सामूहिक अतीत का हिस्सा हैं उसी से ये बौनेसर भी आते हैं, उस बर्बर मध्यकालीन सामूहिक अवचेतन में इन बौनेसरों के या सुकेतों के भय एक जैसे हैं, उनकी भावनाएं भी बहुत हद तक एक जैसी हैं और इस समानता के पुल पर चलते हुए न केवल सुकेत बौनेसर के भयों और भावनाओं में सेंध मार सकता है बल्कि इसी पुल से आते हुए ये बौनेसर भी सुकेतों के भयों को पढ़ लेते हैं.

यही वो पुल है जो उपन्यासकार ने सार्वजनिक आहत भावनाओं और व्यक्तिगत आहत भावनाओं के बीच भी खूबसूरती से निर्मित किया है, जो सुकेत की प्रेमिकाओं करुणा और रचना के छोटे से प्रकरण में नजर आता है, ‘मुनकिरशम्स से नफरत करने वाले इमानदारऔर परहेजगारमाता पिता की संतान फलकके संबंधों की त्रासदी के एक अन्य उल्लेख में भी यह पुल नजर आता है जो विशेष रूप से युवा पीढ़ी के प्रेम और रूढीयों के बीच चलते आये संघर्ष के एक महत्वपूर्ण विषय की तरफ संकेत करता है. इन प्रेम संबंधों की त्रासदियाँ हमारे युवा वर्ग की आंतरिक टूटन को सामने लाती है.

यह टूटन बहुत अर्थों में टूट चुके समाज की अनिवार्य परछाई है जो व्यक्तिगत संबंधों के छोटे डबरों में झलक रही है. समाज का वह भवन जो इन डबरों को घेरकर खड़ा है वह धीरे-धीरे दरक रहा है, और उसकी दरकन का प्रतिबिंब जैसे इन युवाओं के रिश्तों में उजागर हो रहा है. आगे बढ़ते हुए उपन्यास में जब यह प्रश्न उठता है कि क्या कभी ऐसी कोई व्यवस्था बन पाएगी जिसके निर्माण में किसी इंसानी पहचान से नफ़रत का गारा न इस्तेमाल किया गया हो ?’ तो यह इंसानी पहचानराजनीतिक, सामाजिक पहचानों से परे लैंगिक भाषाई पहचानों कि राजनीति को भी कटघरे में खड़ा करती है.

नायकों से चर्चा के दौरान गिरगिट जिन शब्दों को दोहराता है और नायक स्वयं सड़कों पर लगे होर्डिंग्स में जो इबारत पढ़ते हैं वह अपने आप में एक पूरी कहानी है. कला वही जो दिल बहलाए” “साहित्य वही जो मौज कराये” “चिन्तन वही जो झट चेतन कर जाए” “लेखन वही जो झट पल्ले पड़ जाएऔर अंत में बुद्धि वही जो नाकोहस दिलवाए”. इन सबके बाद एक खतरनाक लेकिन केन्द्रीय चेतावनी की तरह गिरगिट का घिनौना वाक्य अत है अपन आहत वाहत होते नहीं, प्यारे अपन तो करते हैं ... भगवान फगवान से नहीं, हमें मतलब है पावर से, मैनेजमेंट से”. इस वाक्य तक आते आते उपन्यास अपने सन्देश को चरम तक उठा लेता है और सब कुछ कह डालता है.

इसके बाद एक अन्य संवाद और में गिरगिट के मुख से जाहिर होता है कि सेक्युलरिज्म आहत भावनाओं का एम्ब्युलेंस है” “और नाकोहस सेक्युलर डेमोक्रेटिक कन्सेंट्स का देहधारी रूप है... यह सब पर निगाह रखता है”. इसी तरह कुछ अन्य नए मुहारों का सृजन भी यहाँ हुआ है सबसे महत्वपूर्ण – ‘सूफ़ीयापे की कढ़ी’, ‘जिससे भय हो उसपर करुणा नहीं होतीइनके साथ ही कुंठित पुन्सत्वऔर कमर से फिसलते पजामे में नैतिक चिंता का नाड़ाजैसे चुभते कटाक्षों ने भाषाई सर्जनात्मकता को भी समृद्ध किया है. इन पंक्तियों में सूचना क्रान्ति के युग में इंटेलेक्चुअल होना पाप है और टेक-नेक्चुअल सबका बाप हैजैसे महावाक्यसे उभरते खतरे को साकार होता देखते हैं.

उपन्यासकार ने इस अंतिम महावाक्यमें जैसे हमारे सारे भयों को साकार कर दिया है. टेक-नेक्चुअल असल में सबका बाप बनता जा रहा है. विषयों और सन्दर्भों की जानकारी के बिना सूचना क्रान्ति के घोड़ों पर अफवाहों और प्रोपेगेंडा की सवारी बड़ी तेजी से चल रही है और आहत भावनाओं के इंधन से इनकी रफ़्तार और पहुँच में चार चाँद लग गये हैं. इस प्रकार होमो-इन्फोमेटीकसमें बदलती जा रही यह पीढी भीतर आहत भावनाएं लिए और बाहर सूचना क्रान्ति के हथियार लिए न जाने किन किन रिमोट कंट्रोल्स के द्वारा एक सामूहिक आत्मघात की तरफ धकियाये जा रही है और गिरगिट, चौडासिंह और सपाट चन्द जैसे पुराने जानकार लेकिन अपने अतीत से शर्माते हुए बौनेसर, संस्कृति-सभ्यता और धर्म का झंडा लहराते हुए हमारे समय को दिशा दे रहे हैं.

चौड़ासिंह से चर्चा में सुकेत और रघु को पता चलता है कि वह काफी कुछ जानकार है सुकेत सोचता है कि "ऐसा आदमी नाकोहस का बौनेसर कैसे बन गया" ठीक यही प्रश्न तीनों नायकों की पेशी के समय उठता है जब नाकोहस प्रमुख गिरगिट महाशय अपने ज्ञान से कटाक्ष करते हैं, तब रघु अपने मित्र सुकेत के आश्चर्य पर विराम लगाते हुए हल्के अंदाज में एक भयानक संकेत करता है. रघु कहता है "मेरा तो कयास है कि इस जॉब में आने से पहले अपने वाले वोकेशन में ही थे... यहां जमाने के पहले खुद इंटेलेक्चुअल ही रहे होंगे" यह सुनकर गिरगिट भभक पड़ता है और कहता है कि उसे अपने अतीत के रेशे रेशे से नफरत है. ये गजब का बिंदु है इस उपन्यास में और मेरी नजर में यही इसका सबसे महत्वपूर्ण सन्देश है, हर इंटेलेक्चुअल एक बिंदु पर आकर पुराना पड़ जाता है और उसकी भी आहत होने योग्य भावनाओं की अपनी लिस्ट तैयार हो जाती है. इंटेलेक्चुअल न जाने कब कैसे टेक-नेक्चुअल में बदलते बदलते होमो-इन्फोमेटिकसबनने की रपटीली राह पर फिसलने लगता है.

यह पतन आज के दौर के लिए बहुत प्रासंगिक है, खासकर प्रगतिशीलता की तरल और चिकनी सी परिभाषा को थामें रहने में असफल कई लोग अचानक पुराणपंथी, दक्षिणपंथी, ब्राह्मणवादी, पोंगापंथी, नक्सली, दलितवादी, नारीवादी, कम्युनिस्ट आदि न जाने क्या क्या करार दे दिए जाते हैं, और इस तरह वृहत्तर समाज से और सार्थक संवाद की संभावनाओं से काट दिए जाते हैं. यह अस्मिताओं के संघर्ष की राजनीति का एक अन्य काला पहलू है जो बहुत अलग किस्म की असुरक्षाओं और भयों का निर्माण कर रहा है. यह बिंदु इसलिए भी महत्वपूर्ण है कि यह स्वयं इस उपन्यास से जुडी एक समस्या को भी व्यक्त करता है.

वह समस्या है गजेन्द्र मोक्षके रूपक के चुनाव से जुडी है, पहली समस्या यह कि इस पौराणिक रूपक से आज की युवा पीढ़ी का कोई सम्बन्ध नहीं रहा गया है और इसी चुनाव से कई अन्य आहत भावनाएं भडक सकती हैं और वह काल्पनिक लेकिन ठोस और सर्वव्यापी अन्तर्यामी नाकोहस अचानक स्वयं उपन्यासकार के खिलाफ ही सक्रिय हो सकता है. हालाँकि यह भी माना जा सकता है कि इस रूपक का चुनाव हमारी प्रगतिशीलता और प्राचीन भारतीय रूपकों के सार्थक सत्व के बीच नजर आने वाले द्वंद्व को लेकर एक नई बहस को सुलगा सकता है.

इस उम्मीद के साथ अंत में कहा जा सकता है कि यह हमारी युवा पीढ़ी के लिए एक अवश्य पठनीय उपन्यास है. विश्वविद्यालय, शिक्षण, मोबाइल, कंप्यूटर, टीवी, विज्ञापन, प्रेम, रोमांस और इन सबकी राजनीति के साथ संस्कृति और प्रगतिशीलता की यह बहस सबके काम की है. खासकर युवाओं के लिए यह भविष्य को लेकर तैयार होने में मदद कर सकने वाली कालजयी रचना है.

-संजय जोठे
* चित्र गूगल से साभार

शनिवार, 14 जनवरी 2017

'नया ज्ञानोदय' का 'साहित्य और सिनेमा का अंतर्संबंध' पर केन्द्रित साहित्य वार्षिकी 2017




खिल उठे पलाश (कहानी संग्रह): मुकेश दुबे


बालकृष्ण भट्ट से लेकर आज तक के व्यंग्य रचनाकारों का लगभग 1000 पृष्ठों का संकलन , ‘उत्कृष्ट व्यंग्य रचनाएं’ दो खंडों में: प्रेम जनमेजय



बालकृष्ण भट्ट से लेकर आज तक के व्यंग्य रचनाकारों का लगभग1000 पृष्ठों का संकलन , ‘उत्कृष्ट व्यंग्य रचनाएंदो खंडों में, यश प्रकाशन द्वारा प्रकाशित हुआ है। इसकी डिजिटल प्रति को लोकार्पण विश्व पुस्तक मेले में किया गया। एक वरिष्ठ रचनाकार की प्रतिक्रिया थी - जो इसमें है वह व्यंग्य लेखन में है और जो इसमें नहीं, वह व्यंग्य लेखन में नहीं।मित्रों मैं यह दंभ नहीं पाल रहा हूं। हां प्रयत्नपूर्वक तटस्थ संपादकीय दृष्टि के साथ सार्थक व्यंग्य के रचनाकारों को सम्मिलित करने का प्रयत्न किया गया है। 

इक्कीसवीं सदी के द्वार पर, पराग प्रकाशन के स्व0 श्रीकृष्ण ने मुझसे अनुरोध किया था कि मैं उनकी महत्वाकांक्षी योजना बीसवीं शताब्दी का साहित्यश्रृंखला के अंतर्गत श्रेष्ठ व्यंग्य रचनाओं का संकलन तैयार करूं। संकलन को तैयार करने में मुझे दो वर्ष से अधिक का समय लगा। श्रीकृष्ण अपनी ईमानदारी के कारण प्रकाशन को अधिक समय तक नहीं चला पाए और उन्होंने पराग प्र्रकाशनबंद कर दिया।बीसवीं शताब्दीः व्यंग्य रचनाएंअनुपलब्ध हो गई। अनेक प्रशंसक पाठक इसे ढूंढते रहे, पर ...।

यश प्रकाशनके शर्मा जी के हाथ यह संकलन लगा तो वे इसी प्रस्तुति एवं सामग्री के प्रशंसक हो गए। उनका कहना था कि पहली बार किसी ने हिंदी व्यंग्य के रचनात्मक इतिहास को , पीढ़ियों में विभाजित कर वैज्ञानिक रूप से प्रस्तुत किया है। उन्होंने अक्टूबर 2013 में मुझसे आग्रह किया कि मैं इसे उत्कृष्ट व्यंग्य रचनाओं के संकलन के रूप में संशोधित करूं तथा इक्कीसवीं सदी में लिखी गई व्यंग्य रचनाओं को सम्मिलित करूं। पिछले डेढ़ दशक में न केवल व्यंग्य की स्वीकर्यता बढ़ी है अपितु उसके रचनकारों में अभूतपूर्व वृद्धि हुई है। व्यंग्य की एक नई पीढ़ी ने जन्म लिया है। इक्कीसवीं के द्वार पर खड़े अनेक युवा व्यंग्यकार आज प्रौढ़ हो चुके हैं।शर्मा जी इस संशोधित एवं परिवर्द्धित संकलन को फरवरी 2014 के विश्व पुस्तक मेले में लाना चाह रहे थे। मुझे लगा कि संशोधन और परिवर्द्धन का कार्य सरल होगा और मैं इसे बाएं हाथ से पूर्ण कर दूंगा। पर कार्य इतना सरल नहीं था। पिछले डेढ़ दशक में प्रकाशित व्यंग्य रचनाओं से न केवल साक्षात्कार करना था वरना उसकी जमीन को भी समझना था। जनवरी 2014 में मैंने शर्मा जी से क्षमा मांगते हुए कहा कि उत्कृष्ट व्यंग्य रचनाओं के संकलन के लिए मुझे समय भी उत्कृष्ट चाहिए। शर्मा जी भी साहित्य की उत्कृष्ट प्रस्तुति में विश्वास करते हैं, अतः उन्होंने मुझे समय दिया और समय देने का परिणाम यह हुआ कि संशोद्धित संस्करण अपने परिवर्द्धन के चलते इतना विशालकाय हुआ कि इसकी काया को एकाकार करना कठिन हो गया। अतः इसे दो खंड में प्रस्तुत करने का विचार किया गया। पहले खंड में हिंदी व्यंग्य की तीसरी पीढ़ी तक के व्यंग्यकारों की रचनाओं को संकलित किया गया है। तथा दूसरे खंड में, चैथीं पांचवी पीढ़ी के साथ विभिन्न विधाओं में सृजनरत , हिंदी व्यंग्य धारा के सहयोगी रचनाकारों की व्यंग्य रचनाओं को सम्मिलित किया गया है।

- प्रेम जनमेजय 

हिंदी कविता का समकालीन परिदृश्य: राहुल देव


प्रकाशक: यश पब्लिकेशन एंड प्राईवेट डिस्ट्रीब्यूशन लिमिटेड, दिल्ली 
ईमेल-: yashpublishersprivatelimited@gmail.com दूरभाष- 09599483884, 85, 86, 87

रात पहेली : इरा का कहानी संग्रह


यह पुस्तक आप भारत पुस्तक भंडार से प्राप्त कर सकते हैं. 

भाषा पर भोपाल में कार्यशाला - भाषासेतु (उर्वशी और भारतीय भाषामंच द्वारा भाषासेतु कार्यशाला की प्रस्तावना )


कानपुर में पिछले दिनों 8 -10 जनवरी 2017 तक भारतीय भाषा के इतिहास में एक अनूठी कार्यशाला * भाषासेतु* का आयोजन हुआ . भारत की समस्त भाषाओं के विद्वानों की एक ही मंच पर उपस्थिति अद्भुत थी . भाषाओं के व्याकरण का तुलनात्मक अध्ययन पर आधारित इस कार्यशाला में कश्मीर से केरल तथा असम से गुजरात तक का प्रतिनिधित्व था . भाषाओं के समन्वय को लेकर ऐसा उत्साह मैंने पहले नहीं देखा . कार्यशाला के संयोजक भाषाविद भाई यशभान सिंह तोमर और भारतीय भाषा मंच के सभी सहयोगी साथियों को साधुवाद .
भाषासेतु कार्यशाला के परिणामों से उत्साहित होकर उर्वशी और भारतीय भाषा मंच द्वारा भाषासेतु कार्यशाला का आयोजन भोपाल में किया जा रहा है . इस कार्यशाला की सम्पूर्ण योजना शीघ्र ही आपके सामने होगी .

भारत में अनेक भाषाएं हैं , हम बहुत सी भाषाओं के बारे में कुछ भी नहीं जानते . क्या हम इन भाषों के बारे में कुछ भी नहीं जानना चाहते ? भारत की भाषाओं को आपस में जोड़ना न केवल हमारी संस्कृति का विस्तार है बल्कि सौहार्द पूर्ण वातारण का निर्माण करने में भी सहायक है .यदि आपको भी अपने देश की भाषाओं से प्रेम है तो आइये - हम सब भारतीय भाषाओं के गौरव की रक्षा करें . कार्यशाला से जुड़ने के लिए मेल आई डी bhashamanch@gmail.com पर अपना परिचय , रुचियाँ , विचार और संपर्क सूत्र भेज सकते हैं . भाषासेतु कार्यशाला में हम आपको बुलाना चाहेंगें - डॉ राजेश श्रीवास्तव , भोपाल

गुरुवार, 12 जनवरी 2017

युवा रचनाशीलता पर केंद्रीय समागम, 14-16 जनवरी 2017, भारत भवन, भोपाल



राष्ट्रीय अनुवाद पुरस्कार से सम्मानित डोगरी साहित्यकार यशपाल निर्मल से बंदना ठाकुर की बातचीत (साक्षात्कार)




यशपाल निर्मल

डोगरी एवं हिंदी भाषा के युवा लघुकथाकार, कथाकार, कवि, आलोचक,लेखक, अनुवादक, भाषाविद् एवं सांस्कृतिककर्मी  यशपाल निर्मल का जन्म 15 अप्रैल 1977 को जम्मू कश्मीर के सीमावर्ती क्षेत्र छंब ज्यौडियां के गांव गड़ी बिशना में श्रीमती कांता शर्मा एवं श्री चमन लाल शर्मा के घर पर हुआ।
आपने जम्मू विश्वविद्यालय से डोगरी भाषा में स्नातकोतर एवं एम.फिल. की उपाधियां प्राप्त की। आपने वर्ष 2005 में जम्मू विश्वविद्यालय से डोगरी भाषा में स्लेट एवं वर्ष 2006 में डोगरी भाषा में यू.जी.सी. की नेट परीक्षा उतीर्ण की । आपको डोगरी,हिन्दी,पंजाबी, उर्दू एवं अंग्रेज़ी भाषाओं का ज्ञान है। आप कई भाषाओं में अनुवाद कार्य कर रहें है। आपने सन् 1996 में एक प्राईवेट स्कूल टीचर के रूप में अपने व्यवसायिक जीवन की शुरुआत की। उसके उपरांत "दैनिक जागरण", "अमर उजाला" एवं "विदर्भ चंडिका" जैसे समाचार पत्रों के साथ बतौर संवाददाता कार्य किया। वर्ष 2007 में आप नार्दन रीजनल लैंग्वेज सैंटर ,पंजाबी यूनिवर्सिटी कैंपस,पटियाला में डोगरी भाषा एवं भाषा विज्ञान के शिक्षण हेतु अतिथि ब्याख्याता नियुक्त हुए और तीन वर्षों तक अध्यापन के उपरांत दिसंबर 2009  से जम्मू कश्मीर कला,संस्कृति एवं भाषा अकैडमी में शोध सहायक के पद पर कार्यरत हैं।
आपने लेखन की शुरुआत वर्ष 1994 में की और सन 1995 में श्रीमद्भागवत पुराण को डोगरी भाषा में अनूदित किया।
सन् 1996 में आपका पहला डोगरी कविता संग्रह " अनमोल जिंदड़ी" प्रकाशित हुआ।
अब तक हिन्दी , डोगरी एवं अंग्रेजी भाषा में विभिन्न विषयों पर 25 पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं। आपके अनुवाद कार्य, साहित्य सृजन ,समाज सेवा,पत्रकारिता और सांस्कृतिक क्षेत्रों  में अतुल्निय योगदान हेतु आपको कईं मान सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त हो चुके हैं जिनमें प्रमुख हैं:-
1. नाटक "मियां डीडो" पर वर्ष 2014 का साहित्य अकादेमी, नई दिल्ली का राष्ट्रीय अनुवाद पुरस्कार।
2. पत्रकारिता भारती सम्मान(2004)
3. जम्मू कश्मीर रत्न सम्मान (2010)
4. डुग्गर प्रदेश युवा संगठन सम्मान (2011)
5. लीला देवी स्मृति सम्मान(2012)
6. महाराजा रणबीर सिंह सम्मान(2013)

आपकी  चर्चित पुस्तकें हैं:-

1. अनमोल जिंदड़ी (डोगरी कविता संग्रह, 1996)
2. पैहली गैं ( कविता संकलन संपादन,2002)
3. लोक धारा ( लोकवार्ता पर शोध कार्य,2007)
4. आओ डोगरी सिखचै( Dogri Script, Phonetics and Vocabulary,2008)
5. बस तूं गै तूं ऐं (डोगरी कविता संग्रह,2008)
6. डोगरी व्याकरण(2009)
7. Dogri Phonetic Reader(2010)
8. मियां डीडो ( अनुवाद,नाटक,2011)
9. डोगरी भाषा ते व्याकरण(2011)
10. पिण्डी दर्शन (हिन्दी,2012)
11. देवी पूजा विधि विधान: समाज सांस्कृतिक अध्ययन ( अनुवाद, 2013)
12. बाहगे आहली लकीर ( अनुवाद, संस्मरण 2014)
13. सुधीश पचौरी ने आक्खेआ हाँ ( अनुवाद, कहानी संग्रह,2015)
14. दस लेख (लेख संग्रह ,2015)
15. मनुखता दे पैहरेदार लाला जगत नारायण ( अनुवाद , जीवनी,2015)
16. घड़ी ( अनुवाद, लम्बी कविता, 2015)
17. समाज-भाशाविग्यान ते डोगरी (2015)
18. साहित्य मंथन ( हिन्दी आलोचना, 2016)
19. डोगरी व्याकरण ते संवाद कौशल (2016)
20. गागर ( लघुकथा संग्रह, प्रकाशनाधीन)

इसके इलावा सैंकड़ो लेख, कहानियां लघु कथाएं एवं कविताएँ समय समय पर राज्य एवं राष्ट्र स्तर की पत्रिकाओं में प्रकाशित।
कई राश्टरीय स्तर की कार्यशालाओं, संगोश्ठिओं, सम्मेलनों, कवि गोश्ठिओं एवं साहित्यक कार्यक्रमों में भागीदारिता।

आप कई साहित्यक पत्रिकाओं में बतौर सम्मानित संपादक कार्यरत हैं जिनमें से प्रमुख हैं:-
1. अमर सेतु (हिन्दी)
2. डोगरी अनुसंधान (डोगरी)
3. सोच साधना(डोगरी)
4. परख पड़ताल(डोगरी)

आपको कई साहित्यक एवं सांस्कृतिक संस्थाओं ने सम्मानित किया हुआ है जिनमें प्रमुख हैं:-
1. राष्ट्रभाषा प्रचार समिति
2. राष्ट्रीय कवि संगम
3. डुग्गर मंच
4. डोगरी भाषा अकैडमी
5.डोगरी कला मंच
6. तपस्या कला संगम
7. त्रिवेणी कला कुंज
8. हिंद समाचार पत्र समूह
9. जम्मू कश्मीर अकैजमी आफ आर्ट , कल्चर एंड लैंग्वेजिज।

पता:- 524, माता रानी दरबार, नरवाल पाईं, सतवारी, एयरपोर्ट रोड, जम्मू-180003.
मोबाइल- 9086118736
Email- yash.dogri@gmail.com

"वैश्विक पटल पर प्रवासी हिन्दी साहित्य" विषय पर अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी


हंसराज कॉलेज, दिल्ली विश्वविद्यालय द्वारा आयोजित "वैश्विक पटल पर प्रवासी हिन्दी साहित्य" विषयक अंतरराष्ट्रीय संगोष्ठी में आपका स्वागत है। 
आमंत्रित वक्ता
तेजेन्द्र शर्मा (लंदन), विख्यात कहानीकार एवं सिनेमा विशेषज्ञ
सुषम बेदी (अमेरिका), सुप्रसिद्ध प्रवासी साहित्यकार 
सत्यकेतु सांकृत, प्रोफेसर, अंबेडकर विश्वविद्यालय दिल्ली 
आशीष कंधवे, सुपरिचित कवि एवं संपादक - आधुनिक साहित्य 
दिनांक- 20 जनवरी 2017 : समय- 12 बजे
स्थान संगोष्ठी कक्ष, हंसराज कॉलेज, दिल्ली। 
नोट- किसी भी देश के प्रवासी साहित्य तथा साहित्यकार पर केन्द्रित लेख आमंत्रित हैं।
लेख Unicode या krutidev में mahenk1987@gmail.com पर भेजें। 
लेख भेजने की अंतिम तिथि 20 जनवरी 2017 है। 
पंजीकरण शुक्ल: प्राध्यापक- 250 रुपए तथा शोधार्थी-200 रुपए।

बुधवार, 11 जनवरी 2017

जल मांगता जीवन: पंकज चतुर्वेदी


' यह पुस्तक प्रत्येक भारतीय को पढ़ी जानी चाहिये और इस के विचारों को जीवन में उतारने का प्रयास करना चाहिए। जल जीवन के लिए अमृत है। इसके मर्म को हमारे पूर्वजों ने समझा था, परंतु आधुनिक जीवन ने जल को प्रदूषित ही नहीं किया है बल्कि जल -स्रोतों को भी नष्ट कर दिया है। आपकी पुस्तक पढ़ते समय कई बार विचार आया कि हम कितने मुर्ख हैं कि आत्म - घात कर रहे हैं, सृष्टि के मूलतत्त्व को भृष्ट एवं नष्ट कर रहे हैं और इसकी चिंता नहीं कर रहे हैं कि भावी पीढ़ियों को हम किस भयानक संकट में छोड़े जा रहे हैं। '
-          - वरिष्ठ साहित्यकार डॉ कमल किशोर गोयनका के 'जल मांगता जीवन ' के लेखक पंकज चतुर्वेदी को लिखे पत्र का एक अंश।


यह पुस्तक विष पुस्तक मेला के हाल 12 में आधार प्रकाशन के स्टाल पर उपलब्ध हें स्टाल संख्या हे 260-263 .

प्रज्ञा की किताब 'नाटक से संवाद' का लोकार्पण




2017 के विश्व पुस्तक मेले के दूसरे दिन 8 जनवरी को अनामिका प्रकाशन से आई डॉ प्रज्ञा की किताब 'नाटक से सम्वाद' का लोकार्पण हुआ.  नाटक पर केंद्रित डॉ प्रज्ञा की यह तीसरी किताब है। किताब का लोकार्पण स्वराज प्रकाशन के स्टाल पर हुआ। शीर्षक की प्रामाणिकता को पुस्तक के लोकार्पण में भलीभाँतिपूर्वक देखा जा सकता था.इस अवसर पर दो वरिष्ठ नाट्यचिन्तक-डॉ प्रताप सहगल, प्रो देवेंद्रराज अंकुर ने विस्तार से अपनी बात नाटक और प्रज्ञा की नाट्य आलोचना दृष्टि पर केंद्रित की।  कार्यक्रम का संचालन डॉ राकेश कुमार ने किया। सम्वाद की शुरुआत नाटककार-आलोचक प्रताप सहगल जी ने की।  जिसमें उन्होंने पुस्तक की विषयगत विविधता जैसे- बाल रंगमंच, नुक्कड़ नाटक, अस्मिता रंगमंच, अभिनेता व नाटककार के साथ सम्वाद और नाट्य संस्थाओ की भूमिका पर विस्तार से चर्चा की. उन्होंने किताब के आने को एक घटना के रूप में लेते हुए कहा कि "नाटक पर केंद्रित किताबें कम हैं और अच्छी किताबें बहुत कम हैं। उसमें प्रज्ञा की किताब सुचिंतित तरीके से,रंग दृष्टि से और मंजी हुई भाषा में लिखी गई किताब है।" उन्होंने 'माधवी' और नाटककार विजय तेंदुलकर पर आधारित लेखों को बेहद जरूरी बताया।  प्रसिद्ध रंगकर्मी और रंग चिन्तक देवेंद्र राज़ अंकुर जी ने डॉ  प्रज्ञा के नाटक की दृष्टि से किये गए  पहले के कामों- में नुक्कड़ नाटक की स्थापना को लेकर लिखा गया पुस्तक 'नुक्कड़ नाटक: रचना और प्रस्तुति' तथा नुक्कड़ नाटक संचयन 'जनता के बीच जनता की बात' सरीखे मह्त्वपूर्ण कामों के लिए बधाई दी. उनके सम्वादों में रंगमंच की एक चिंता साफ झलक रही थी कि नाटक और उसके मंचन के बारे में जो पढा-लिखा तथा शोध किया जा रहा है वह बेहद सतही होता है. जिसमें हम नाटक पर काम तो करते हैं लेकिन अपने किताबों  से निकल रंगमंच की दुनिया को देखने की जहमत भी नहीं उठा पाते. नाटकों की समझ को पुख्ता बनाने के लिए जरुर रंगमंच की चार दीवारी में प्रवेश करना होगा तभी रंगकर्म पर सार्थक लिखा-पढा जाना सार्थक हो पायेगा. इस दृष्टि से उन्होंने प्रज्ञा के काम का मूल्यांकन विश्वविद्यालयों की दृष्टि से बाहर रंगमंच की दृष्टि के भीतर माना। उनका कहना था प्रज्ञा  का काम उसी सार्थकता की तलाश है और उम्मीद है इसी तरह वे अपना सम्वाद नाटकों से हमेशा कायम रखें.  उन्होंने ये भी कहा कि "अब तक नाटक में सम्वाद की बात होती थी प्रज्ञा ने नाटक से सम्वाद की बात की है। दोनों वरिष्ठ रंगकर्मी ने 'माधवी' और विजय तेन्दुलकर पर लिखे लेख की प्रशंसा की. अस्मिता नाट्य संस्था के अरविन्द गौड़ जी से रंगमंच के बारे में तथा पुस्तक के बारे में बातें हुई.
इस अवसर पर वरिष्ठ साहित्यकार जयप्रकाश कर्दम , रमेश उपाध्याय ,प्रेम जनमजेय के अलावा कवि-व्यंग्यकार लालित्य ललित , नामदेव  और स्वराज प्रकाशन के अजय मिश्रा ने भी प्रज्ञा को अपनी शुभकामनाएं दीं। प्रेम जनमेजय जी ने कहा "प्रज्ञा की क्षमताओं पर मुझे पूरा भरोसा है। इनसे बहुत अपेक्षाएं हैं। नाटक पर लिखते रहने के साथ ये कहानियां लिखना कभी न छोड़ें।"
इस अवसर पर नामदेव, राज बोहरे,अपराजिता,संज्ञा उपाध्याय, अंकित, विकास, मनीषा ,राजीव, बरखा,साजिद, देवेश, दीपक, ललिता जैसे रचनाकार, शोध छात्र और युवा रंगकर्मी भी मौजूद थे। मेले के माहौल में भी इस गम्भीर कार्यक्रम के समापन पर प्रज्ञा ने सबका आभार व्यक्त करते हुए कहा-" मैं विश्वास दिलाती हूँ नाटक से सम्वाद की मेरी यात्रा चलती रहेगी और मुझे भरोसा है इस किताब को पढ़कर आप भी मुझसे सम्वाद करेंगे।
 
प्रस्तुति

राजीव कार्तिकेय

मंगलवार, 10 जनवरी 2017

सच्चिदानंद जोशी की लोकप्रिय कहानियाँ


यह कहानी संग्रह प्रभात प्रकाशन द्वारा प्रकाशित किया गया है। राष्ट्रीय पुस्तक मेले में इसका लोकार्पण 14 जनवरी को सायं 4 बजे प्रभात प्रकाशन के स्टाल पर किया जाएगा.

कविता-संग्रह 'दिव्य कैदखाने में': राकेश रंजन


प्रगति मैदान, दिल्ली में आयोजित विश्व पुस्तक मेले में नया कविता-संग्रह 'दिव्य कैदखाने में' 13 जनवरी से राजकमल के स्टाल पर उपलब्ध रहेगा।

आधुनिक साहित्य का नया अंक, वर्ष -6, अंक-20-21


यह अंक पढ़ने हेतु लिंक पर जाएँ- https://issuu.com/ashishkandhway/docs/adhunik_sahitya_oct_16-mar_17__comp

आधुनिक साहित्य के निरंतर प्रकाशन का छठा वर्ष. हम अपने सभी पाठकों एवं लेखकों का आभार प्रकट करते हैं. आशीष कंधवे प्रधान संपादक आधुनिक साहित्य

नीलोत्पल मृणाल की रचनाएँ


दालमोठ भर कटोरी रखा है सामने/ नीलोत्पल मृणाल

रात-रात भर जागते रहिये
टुकुर-टुकुर ताकते रहिये

दालमोठ भर कटोरी रखा है सामने
हल्का-हल्का फांकते रहिये

आपसे न किसी का सुख बाँटा जाएगा
ना ही आपसे किसी का दुःख बाँटा जाएगा

आप खिलाड़ी हैं बस तास बाँटते रहिये
दालमोठ भर कटोरी ..........................

सबको देने वाले सुलतान की
बेबसी तो जरा देखिये

सबसे बढ़ा के हाथ
खैनी मांगते रहिये
दालमोठ भर कटोरी..............

किसी बहाने तो आये
आपकी आँख में आँसू

बादशाह चाक़ू लीजिये
प्याज काटते रहिये
दालमोठ भर कटोरी.......

आपसे किसी के पेट की
ना आग बुझाई जायेगी

आप बस शराब में
पानी डालते रहिये
दालमोठ भर कटोरी.......

हाथों में हुनर गज़ब का है
निशाना चूकता नहीं आपका

उछल-उछल के मच्छर मारते रहिये
दालमोठ भर कटोरी.......

बड़े नाजुक हैं आप
आपसे ना दरिया में तैरा जाएगा

कूद-कूद के नाली टापते रहिये
दालमोठ भर कटोरी............

आपसे फटी मुफलिसी में
किसी पैबंद की उम्मीद नहीं

आप बस रेशम में टांका टांकते रहिये
दालमोठ भर कटोरी रखा है सामने
हल्का-हल्का फांकते रहिये

आगे सुनिए उनके गीत उनकी कविता उनकी आवाज़ में- 






उनकी लेखनी यहाँ भी-
http://globalgumti.com/category/%E0%A4%A8%E0%A5%80%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%AA%E0%A4%B2/